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हाईटेक होगा जनजातीय संग्रहालय, VR से देख सकेंगे 46 जनजातियों की संस्कृति और विरासत

भोपाल। मध्य प्रदेश की जनजातीय संस्कृति, कला, जीवनशैली और विरासत को आधुनिक तकनीक के जरिए लोगों तक पहुंचाने की दिशा में नई पहल की जा रही है। मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय के परिसर में करीब 1,100 वर्ग फुट क्षेत्र में अत्याधुनिक व्याख्या केंद्र बनाया जाएगा। इस केंद्र में वर्चुअल रियलिटी (VR), बड़ी एलईडी स्क्रीन और हाई-एंड साउंड सिस्टम जैसी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होंगी। यहां आने वाले पर्यटक तकनीक की मदद से प्रदेश की विभिन्न जनजातियों की अनूठी दुनिया को करीब से जान और समझ सकेंगे।
प्रस्तावित व्याख्या केंद्र को इस तरह तैयार किया जाएगा कि संग्रहालय में आने वाले पर्यटकों के साथ शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों को भी इसका लाभ मिल सके। केंद्र में एक साथ करीब 24 लोगों के बैठने की व्यवस्था होगी। यहां डिजिटल माध्यम से जनजातीय समुदायों की संस्कृति, परंपराओं, जीवनशैली, कला और विरासत से संबंधित सामग्री प्रदर्शित की जाएगी।
इस केंद्र की सबसे खास सुविधा वर्चुअल रियलिटी सेटअप होगा। इसके माध्यम से पर्यटक संग्रहालय का वीआर टूर कर सकेंगे। यानी संग्रहालय के अलग-अलग हिस्सों और जनजातीय संस्कृति से जुड़ी प्रस्तुतियों को आधुनिक डिजिटल तकनीक के माध्यम से अनुभव किया जा सकेगा। इससे विशेष रूप से छात्रों और शोधकर्ताओं को जनजातीय संस्कृति समझने का एक नया माध्यम मिलेगा।
मध्य प्रदेश में करीब 1.5 करोड़ आदिवासी आबादी निवास करती है। यह आबादी लगभग 46 अलग-अलग जनजातियों से संबंधित है। प्रत्येक जनजाति की अपनी विशिष्ट सामाजिक व्यवस्था, परंपराएं, कला, लोकगीत, नृत्य, पहनावा और जीवनशैली है। प्रस्तावित व्याख्या केंद्र में इन्हीं विविधताओं को आधुनिक तकनीक के साथ प्रस्तुत करने की तैयारी है।
केंद्र में लगाई जाने वाली बड़ी एलईडी स्क्रीन पर जनजातीय जीवन से जुड़े वीडियो, तस्वीरें और दूसरी डिजिटल सामग्री दिखाई जा सकेगी। इसके साथ हाई-एंड साउंड सिस्टम की मदद से जनजातीय संगीत, लोकगीत और अन्य ऑडियो-विजुअल सामग्री का बेहतर अनुभव मिलेगा। इस व्यवस्था का उद्देश्य दर्शकों को केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि उन्हें जनजातीय संस्कृति से जुड़ा अनुभव भी प्रदान करना है।
वर्चुअल रियलिटी तकनीक इस पूरे केंद्र का प्रमुख आकर्षण बनने वाली है। वीआर के जरिए किसी स्थान या वातावरण को डिजिटल रूप से इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है कि दर्शक खुद को उस परिवेश के बीच मौजूद महसूस कर सकें। जनजातीय संग्रहालय में इस तकनीक के इस्तेमाल से पारंपरिक जीवन, कला और संस्कृति को नए अंदाज में समझने का अवसर मिलेगा।
व्याख्या केंद्र केवल पर्यटकों के लिए मनोरंजन का माध्यम नहीं होगा। इसे शोध और शिक्षा की दृष्टि से भी उपयोगी बनाने की योजना है। जनजातीय समाज, इतिहास, कला और संस्कृति पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं के लिए यहां उपलब्ध डिजिटल सामग्री महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थियों को भी जनजातीय विरासत के बारे में जानकारी हासिल करने में मदद मिलेगी।
केंद्र की वास्तुकला पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। आधुनिक तकनीक से लैस होने के बावजूद इसका बाहरी स्वरूप मुख्य जनजातीय संग्रहालय भवन से अलग दिखाई नहीं देगा। इसके मुखौटे को तैयार करने में मिट्टी और बांस का इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि नई संरचना संग्रहालय की मौजूदा वास्तुकला के साथ स्वाभाविक रूप से घुल-मिल सके।
इस तरह केंद्र के भीतर आधुनिक डिजिटल तकनीक होगी, जबकि बाहर से उसका स्वरूप पारंपरिक और जनजातीय स्थापत्य की भावना को दर्शाएगा। आधुनिकता और पारंपरिक डिजाइन का यह मेल केंद्र की विशेष पहचान बन सकता है।
मध्य प्रदेश की जनजातीय विरासत बेहद समृद्ध और विविध है। प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले जनजातीय समुदायों की परंपराओं में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अंतर देखने को मिलता है। उनके रहन-सहन, आवास, कृषि पद्धतियों, लोककथाओं, धार्मिक मान्यताओं, त्योहारों और कला में उनकी विशिष्ट पहचान दिखाई देती है।
ऐसे में करीब 46 जनजातियों की संस्कृति को एक ही स्थान पर समझना आसान नहीं होता। व्याख्या केंद्र में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल इस चुनौती को कम कर सकता है। वीडियो, ऑडियो और वीआर के जरिए अलग-अलग जनजातीय समुदायों से जुड़ी जानकारी को व्यवस्थित तरीके से दर्शकों तक पहुंचाया जा सकेगा।
इस पहल से जनजातीय विरासत के संरक्षण और उसके प्रचार-प्रसार को भी मजबूती मिलने की उम्मीद है। समय के साथ जीवनशैली में बदलाव के कारण कई पारंपरिक कलाएं और सांस्कृतिक परंपराएं नई पीढ़ी से दूर होती जा रही हैं। डिजिटल माध्यम से इनके दस्तावेजीकरण और प्रदर्शन से भविष्य की पीढ़ियों को भी इनके बारे में जानने का अवसर मिलेगा।
जनजातीय संग्रहालय में आने वाले ऐसे पर्यटक, जिन्हें प्रदेश की जनजातियों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, उनके लिए यह केंद्र शुरुआती परिचय का काम कर सकता है। वीआर टूर और ऑडियो-विजुअल प्रस्तुति देखने के बाद वे संग्रहालय में प्रदर्शित वस्तुओं और कलाकृतियों के सांस्कृतिक महत्व को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।
लगभग 1,100 वर्ग फुट में विकसित होने वाला यह केंद्र आकार में भले ही सीमित होगा, लेकिन इसमें इस्तेमाल होने वाली तकनीक इसे खास बनाएगी। 24 लोगों की बैठने की व्यवस्था होने से छोटे समूहों, विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के लिए विशेष प्रस्तुतियां भी आयोजित की जा सकेंगी।
पर्यटन की दृष्टि से भी यह पहल महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। आधुनिक तकनीक के जरिए संग्रहालयों को अधिक संवादात्मक और आकर्षक बनाने का चलन बढ़ रहा है। विशेष रूप से युवा दर्शकों और विद्यार्थियों को वीआर जैसी तकनीक आकर्षित करती है। ऐसे में जनजातीय संग्रहालय में वीआर अनुभव उपलब्ध होने से पर्यटकों की दिलचस्पी और बढ़ सकती है।
प्रस्तावित व्याख्या केंद्र की खासियत यह होगी कि वह आधुनिक तकनीक और पारंपरिक जनजातीय पहचान के बीच एक सेतु का काम करेगा। एक तरफ एलईडी स्क्रीन, हाई-एंड साउंड सिस्टम और वर्चुअल रियलिटी जैसी तकनीक होगी, वहीं दूसरी ओर मिट्टी और बांस से तैयार बाहरी स्वरूप जनजातीय स्थापत्य की झलक देगा।
कुल मिलाकर मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय में बनने वाला यह हाईटेक व्याख्या केंद्र प्रदेश की करीब 1.5 करोड़ जनजातीय आबादी और लगभग 46 जनजातियों की समृद्ध विरासत को नए अंदाज में प्रस्तुत करेगा। इसके तैयार होने के बाद पर्यटक, विद्यार्थी और शोधकर्ता न केवल संग्रहालय का वर्चुअल दौरा कर सकेंगे, बल्कि जनजातीय समुदायों की संस्कृति, कला, परंपरा और जीवनशैली को आधुनिक तकनीक के जरिए और करीब से समझ सकेंगे।





